ज्याचा त्याचा ग़ालिब [ विडंबन- हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी ]


१) वैतागलेला मतदार
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे ’बम’ निकले
बहुत निकले मेरे ’नोटा’ज़, लेकिन फिर भी कम निकले

२) ताई
डरे क्यों मेरा दादा, क्या रहेगा उसके होटों पर
वो ’सू’, जो डॅम-ए-तर से उम्र यूँ दम-ब-दम निकले

३) ’ नो उल्लू बनाविंग’ मोडमध्ये असलेला मतदार
निकलना ’आय’ से ’साहब’ का सुनते आये है लेकिन
बहुत चालाक अब होकर तेरे चन्गु‌ल से हम निकले

४) साहेब !
अगर तुड़वाये कोई उनकी ’युति’ तो हमसे तुड़वाये
हुआ घोष और सर से पाँव तक बन बेशरम निकले

५) भ्रमनिरास झालेला मतदार
बिजेपी में नहीं है फ़र्क पापों और पुण्यों का
उसी को खेंचकर लाते है जिस गावित पे दम निकले

६) मनसेकडे पर्याय म्हणून बघणारा मतदार
ख़ुदा के वास्ते पर्दा न इन्जन से उठा ज़ालिम
कहीं ऐसा न हो याँ भी वही खोटे करम निकले

७) पृथ्वीराजबाबा
कहाँ एन्सिपी का दरवाज़ा ’स्वामी’ और कहाँ भाजप
पर इतना जानते है कल वो जाता था कि हम निकले

-- स्वामी संकेतानन्द 
नवी दिल्ली,
०१-१०-२०१४ 

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