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उर्दू नज़्म लेबलसह पोस्ट दाखवत आहे

सफ़र

उसकी ख़ानाबदोशी वो हिज़्र की रातें सूरज की तपीश बेदरख़्त वीरानें उफ़क़ तक फ़ैले रेत के टीलें.. आहिस्ता आहिस्ता दीन-ओ-इमाँ की रटीं बातें जाती रहीं आँखों में रची-बसी चकाचौंध टिमटिम चाँदनी में फ़ना होती रहीं दिमाग़ी गलियारों से जज़्बातों का एक-एक पुलिन्दा राह में गिरता रहा.. वहदत-उल-वजूद की बातें मिटती रहीं बुतपरस्ती की चाहतें बुझती रहीं और फिर सारी हिकारत उसके जेहन से जाती रही.. क्या वो पशेमाँ था? जी नहीं क्या वो हैराँ था? शायद.... क्या पता? ... शायद.... - नई दिल्ली, ०४-०९-२०१४