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सार्थक? निरर्थक?

प्रतिक्रियावादी समाज में समाहित  सारे क्रियाकलापों के, सारे होहल्लों के, सारे हुड़दंगों के मध्य में कोई इतना सुस्थिर कैसे रह सकता है? क्या यह स्थितप्रज्ञता है? या है निठल्लापन?  संवेदनाओं के सागर में गोते लगाना ही क्या जीवन का सार्थक है? या निरर्थक है जीवन की सार्थकता का अनुसंधान? -संकेत

उपरांत

चंदन पर खिलेंगे पावक-मुकुल धरा और व्योम भावुक, व्याकुल दाह दमकेगा कोपल कोपल संध्या सुरभित  सांद्र सोनल अस्वस्थ स्वर क्रंदन विमल जीवन चक्र सम्पूर्ण सुफल लौट जाएँगे मानुष विकल विदग्ध काष्ठ अचेत शीतल दीप्तिमान किन्तु समय का स्मृति-पटल अविरत... अटल. - संकेत

देव गंधार

तुम जब देव गंधार गाती हो संसारबंधनों में जकड़ जाती है फिर से यह विमुक्त आत्मा  तुम्हारे नीरजनयनों के नीर से भीगे भावुक पल पुन: लौट आते हैं  और तुम से दूर जाने का मेरा हर एक प्रयास तुम्हारे अधरों पर थम जाता है -संकेत