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ग़ज़ल:- अच्छे दिनों के सारे तमाशाई है

क्या खूब चर्चे हैं! क्या पज़ीराई* है! दीवानगी है क्या! क्या मसीहाई है! आसार है के 'आँधी' चलेगी फिर से इन हवाओं से अपनी शनासाई* है इतिहास की पुस्तक में पढ़ेंगे बच्चे, 'सब बाप-दादाओं की मुनाफ़ाई है|' चौपाल पर पत्ते कूटते बैठे हैं अच्छे दिनों के सारे तमाशाई है सच बोल देता हूँ भरी महफ़िल में अपनी यही आदत जान पर आई है -- संकेत, नई दिल्ली, १२ अक्टुबर, २०१४ *पज़ीराई = आवभवत, स्वागत, reception *शनासाई = परिचय, acquaintance ------------------------------------------------------

ये ज़मीं हैं सितारों की

हम कहें क्या कहानी अजी , बदगुमाँ इन बयारों की जब समझ ही न पाए ज़ुबां, आज भी यह इशारों की चंद बूँदें लहू की गई , तो क़यामत नहीं आई तलब तो मिटेगी सही, कुछ लहू के बिमारों की अब यहाँ जिस्म तो बिक गया, मोल तो हो अनाजों का  ये कहानी नहीं काफिरों , हैं हकीकत बज़ारों की बख्श दो फिसल जो हम गए, आपकी आशिकी में यूँ कुछ खता तो हमारी रही, कुछ रही इन बहारों की आज अखबार पढ़ के मुझे, ये पता तो चला यारों ये नहीं अब हमारी रही, ये ज़मीं हैं सितारों की 

मजला कळले नाही

पाप पुण्यात घोळ केला, मजला कळले नाही हाय हिशोब का चुकावा, मजला कळले नाही आज अशी अबोल वीणा, मलहार असा वेडा सूर कसे संपास गेले, मजला कळले नाही मी जपले सखे मनाला, धुंद रात जरी होती हा गजरा इथे कसा गे, मजला कळले नाही सात जन्मांचि गाठ होती , पहिला सरला नाही हात असा कसा कसा सुटावा, मजला कळले नाही दोनच थेंब हो रक्ताचे , तलवार असे हाती हा कसला असे पुरावा, मजला कळले नाही    मी मराठी या संकेतस्थळावर   पूर्वप्रकाशित दुवा :- http://www.mimarathi.net/node/6094

केला होता करार जरी

केला होता  करार जरी मी, नियतीने कधीच पाळला नाही रात्रच अशी भयाण काळी होती, सूर्य देखील उगवला नाही दिवस नवा उजाडता, फक्त स्वप्नांचीच लक्तरे ढगांनीच नेहमी बरसावे, नियम बनला नाही हातावरच्या रेषा माझ्या,वळत्या हो कुणी केल्या मार्ग असा नागमोडी,सावलीपण सोबतीला नाही अस्वस्थ मनाचे हुंदके, सरणावरच अखेर थांबले अस्थी गोळा करायला, कुणीच कसा थांबला नाही पापण्या मिटल्या म्हणे, फक्त स्वप्नांच्याच ओझ्याने पण सूर्य निजलेला दिवसा, मला कधीच दिसला नाही

ग़ज़ल - कुछ ज़ख़्म हमारे ....

कुछ ज़ख़्म हमारे यूँ गहरे हो गये मरहम लगाया फिर भी हरे हो गये    दोस्त साथ ना दें तो कोई ग़म नहीं दुश्मन अब जाँ से भी प्यारे हो गये नाता तोड़ चुकें  बरसात से भी हम घर में आसुँओं के फ़वारे हो गये रेत के महल थे, ढह गये तो क्या ग़म सूरज की तपन के नज़ारें हो गये हिसाब भी क्या रखना बिती यादों का कुछ पल मेरे कुछ तुम्हारे हो गये तन्हाईयों से दूर भागते रहे ’संकेत’ अब उसी के सहारे हो गये