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ग़ज़ल:- अच्छे दिनों के सारे तमाशाई है

क्या खूब चर्चे हैं! क्या पज़ीराई* है! दीवानगी है क्या! क्या मसीहाई है! आसार है के 'आँधी' चलेगी फिर से इन हवाओं से अपनी शनासाई* है इतिहास की पुस्तक में पढ़ेंगे बच्चे, 'सब बाप-दादाओं की मुनाफ़ाई है|' चौपाल पर पत्ते कूटते बैठे हैं अच्छे दिनों के सारे तमाशाई है सच बोल देता हूँ भरी महफ़िल में अपनी यही आदत जान पर आई है -- संकेत, नई दिल्ली, १२ अक्टुबर, २०१४ *पज़ीराई = आवभवत, स्वागत, reception *शनासाई = परिचय, acquaintance ------------------------------------------------------

... अच्छा हुआ

अब के अकाल रहा, अच्छा हुआ जीना मुहाल रहा, अच्छा हुआ कुछ ना अवाम कहें, अच्छा नहीं थोड़ा बवाल रहा, अच्छा हुआ कोई जवाब मिले या ना मिले कोई सवाल रहा, अच्छा हुआ सब के जवाब दिए सरकार ने मेरा सवाल रहा, अच्छा हुआ कोई मुराद पुरी करते अभी थोड़ा मलाल रहा, अच्छा हुआ राहत मिलें न मिलें, चर्चा रहा भाषण कमाल रहा, अच्छा हुआ ’अपने नसीब खिले’ , उसने कहा, ’ अब के अकाल रहा, अच्छा हुआ’ --- पुणे, १८ मार्च, २०१३