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चेहरे

आश्वासनास भुलले चेहरे काळोख पीत निजले चेहरे हातात आंधळ्यांच्या, बंदुका.. रक्तात हाय, भिजले चेहरे! त्यांची नज़र ढगांना बोचली अन् वावरात रडले चेहरे मी कळवळून गातो मर्सिया अन् दाद देत बसले चेहरे लिहतोस तू कुणासाठी गझल त्यांचे कधीच थिजले चेहरे -- संकेत, नवी दिल्ली,  ३० ऑगस्ट , २०१५  -------------------------------------------------- आणि जाताजाता ग़ालिबच्या एका शेराचा अनुवाद:- सगळेच काय दडले चेहरे? काही फुलांत दिसले चेहरे मातीत काय शोधीशी अता? झाले विलीन, लपले चेहरे मूळ शेर :- सब कहाँ, कुछ लाल:-ओ-गुल में नुमायाँ हो गईं ख़ाक में क्या सूरतें होंगी, कि पिन्हाँ हो गई -- नवी दिल्ली, १९ ऑगस्ट,२०१५ 

विडंबन- चालवून टाक चीप

चालवून टाक चीप, जागतीक अर्थ मंद   राजना रिसेशनात कोण बैंक होय बंद त्या युरोकुली भरीस, भांडते अजून ग्रीस बाय तू करू नकोस, एक वर्ष स्टॉक बंद  गीत गात 'टू बिगा'चं, बेलआउटी उगाच  सावकार आधुनीक, की मती असेल मंद  गार गार एक्सपोर्ट चीन मोरली सपोर्ट  गाउनी गुलाबगीत खात जा गुलाबकंद  ते तुलाच रे कळेल, कोण कोण रे जळेल  सांग ना अता खरेच, टोकियो कि ताशकंद? हाय ते इझी मनीत, क्यूइने कबर खणीत सांग घेउनी बुडेेल, सैमला अनर्थछंद -- स्कैमी संकेतानंद  ;) नवी दिल्ली,  ०८ जुलै , २०१५ 

ग़ज़ल:- अच्छे दिनों के सारे तमाशाई है

क्या खूब चर्चे हैं! क्या पज़ीराई* है! दीवानगी है क्या! क्या मसीहाई है! आसार है के 'आँधी' चलेगी फिर से इन हवाओं से अपनी शनासाई* है इतिहास की पुस्तक में पढ़ेंगे बच्चे, 'सब बाप-दादाओं की मुनाफ़ाई है|' चौपाल पर पत्ते कूटते बैठे हैं अच्छे दिनों के सारे तमाशाई है सच बोल देता हूँ भरी महफ़िल में अपनी यही आदत जान पर आई है -- संकेत, नई दिल्ली, १२ अक्टुबर, २०१४ *पज़ीराई = आवभवत, स्वागत, reception *शनासाई = परिचय, acquaintance ------------------------------------------------------

... अच्छा हुआ

अब के अकाल रहा, अच्छा हुआ जीना मुहाल रहा, अच्छा हुआ कुछ ना अवाम कहें, अच्छा नहीं थोड़ा बवाल रहा, अच्छा हुआ कोई जवाब मिले या ना मिले कोई सवाल रहा, अच्छा हुआ सब के जवाब दिए सरकार ने मेरा सवाल रहा, अच्छा हुआ कोई मुराद पुरी करते अभी थोड़ा मलाल रहा, अच्छा हुआ राहत मिलें न मिलें, चर्चा रहा भाषण कमाल रहा, अच्छा हुआ ’अपने नसीब खिले’ , उसने कहा, ’ अब के अकाल रहा, अच्छा हुआ’ --- पुणे, १८ मार्च, २०१३

ये ज़मीं हैं सितारों की

हम कहें क्या कहानी अजी , बदगुमाँ इन बयारों की जब समझ ही न पाए ज़ुबां, आज भी यह इशारों की चंद बूँदें लहू की गई , तो क़यामत नहीं आई तलब तो मिटेगी सही, कुछ लहू के बिमारों की अब यहाँ जिस्म तो बिक गया, मोल तो हो अनाजों का  ये कहानी नहीं काफिरों , हैं हकीकत बज़ारों की बख्श दो फिसल जो हम गए, आपकी आशिकी में यूँ कुछ खता तो हमारी रही, कुछ रही इन बहारों की आज अखबार पढ़ के मुझे, ये पता तो चला यारों ये नहीं अब हमारी रही, ये ज़मीं हैं सितारों की 

ग़ज़ल - कुछ ज़ख़्म हमारे ....

कुछ ज़ख़्म हमारे यूँ गहरे हो गये मरहम लगाया फिर भी हरे हो गये    दोस्त साथ ना दें तो कोई ग़म नहीं दुश्मन अब जाँ से भी प्यारे हो गये नाता तोड़ चुकें  बरसात से भी हम घर में आसुँओं के फ़वारे हो गये रेत के महल थे, ढह गये तो क्या ग़म सूरज की तपन के नज़ारें हो गये हिसाब भी क्या रखना बिती यादों का कुछ पल मेरे कुछ तुम्हारे हो गये तन्हाईयों से दूर भागते रहे ’संकेत’ अब उसी के सहारे हो गये