ग़ज़ल - कुछ ज़ख़्म हमारे ....


कुछ ज़ख़्म हमारे यूँ गहरे हो गये
मरहम लगाया फिर भी हरे हो गये   

दोस्त साथ ना दें तो कोई ग़म नहीं
दुश्मन अब जाँ से भी प्यारे हो गये

नाता तोड़ चुकें  बरसात से भी हम
घर में आसुँओं के फ़वारे हो गये

रेत के महल थे, ढह गये तो क्या ग़म
सूरज की तपन के नज़ारें हो गये

हिसाब भी क्या रखना बिती यादों का
कुछ पल मेरे कुछ तुम्हारे हो गये

तन्हाईयों से दूर भागते रहे
’संकेत’ अब उसी के सहारे हो गये

११ टिप्पण्या:

  1. वाह वाह..हया क्षेत्रातही तु आहेस का...सहीये...मस्त जमलीये...लगे रहो संकेत भाय.. :)

    प्रत्युत्तर द्याहटवा
  2. सुंदर !!

    तुझी मातृभाषा मराठी आहे की तामिळ की हिंदी/उर्दू असा एक रास्त प्रश्न आम्हांस पडलेला आहे !!

    प्रत्युत्तर द्याहटवा
  3. गझलकें ये लफ्ज तुमने युं लिखे है दर्दी,
    हम तो आपके दिवाने हो गये पारधी,
    इतनाभी खुब मत लिख मेरे दोस्त के,
    वाह तक ना निकले तारिफ करने यह खुबसुरती...

    प्रत्युत्तर द्याहटवा
  4. अप्रतिम,
    तुझी मातृभाषा मराठी/तामिळ/हिंदी/उर्दू यांपैकी कुठली आहे हा प्रश्न आम्हां पामरांस पडला आहे!

    प्रत्युत्तर द्याहटवा
  5. @ devenda :- धन्स रे दादा.. हो मी या क्षेत्रातही आहे... :-D

    प्रत्युत्तर द्याहटवा
  6. सौरभदा :- शुक्रिया .. हमारी तारिफ मे आपने ये जो कसिदे गढ़े हैं , उसके लिये शुक्रिया !!

    प्रत्युत्तर द्याहटवा
  7. @ heramb & Vidyadharbaba :-
    सामूहिक धन्यवाद देतो कारण तुम्हाला माझ्या मातृभाषेबद्दल सामूहिक प्रश्न पडलाय !!! मला सगळ्या भाषा मातृभाषेसारख्याच रे !!! (politically correct answer :-D )

    प्रत्युत्तर द्याहटवा
  8. यह मेरे जख्मोंकी गलती नहीं है जानम
    खुशकिस्मती है मेरी के कोई मरहम इलाज नहीं करता

    प्रत्युत्तर द्याहटवा

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