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देव गंधार

तुम जब देव गंधार गाती हो संसारबंधनों में जकड़ जाती है फिर से यह विमुक्त आत्मा  तुम्हारे नीरजनयनों के नीर से भीगे भावुक पल पुन: लौट आते हैं  और तुम से दूर जाने का मेरा हर एक प्रयास तुम्हारे अधरों पर थम जाता है -संकेत

सालगिरह

हर बरस सालगिरह पर यूँ ही हँसते हँसते हर कोई उम्र में इक साल बढ़ा लेता है वक़्त एक सेंध लगाता हुआ आहिस्ता से उम्र के पेड़ से एक शाख चुरा लेता है वक़्त के अपार इतिहास में झाँको तो ज़रा कहाँ वर्तमान, कहाँ भूत, कहाँ भविष्य है उम्र बढ़ती नहीं घटती हैं, हर एक साल के बाद वक़्त आगे नहीं पीछे की तरफ़ चलता है वक़्त आज़ाद परिन्दा हैं, ये अमर है आज तक ये किसी ज़ंजीर से जकड़ा न गया तर्क और भावनाओं की सब कोशिशें नाकाम रहीं ये परिन्दा किसी शिकारी से पकड़ा न गया ज़िन्दगी तो ग़मों की किताब हैं दोस्त साल के बाद पन्ना जिसका उलट जाता है पढ़ चुके कितना इसे, बाक़ी बची है कितनी ऐसा सोचा तो दिल आँखों में सिमट आता है मौत का ज़िक्र भयानक है, मगर आज के दिन, उल्टी लटकी हुई तसवीर को कुछ सीधा करें फ़िक्र और  अहसास की इक और बुलन्दी छूकर आओ, कुछ देर तक माहौल को गंभीर करें..... !! -- मैंने मूल उर्दू नज़्म का हिंदुस्तानी(हिंदी+उर्दू, बोलचाल की भाषा) में अनुवाद किया है. कवी का नाम तो पता नहीं, लेकिन इतनी खूबसूरत नज़्म लिखने के लिए उन्हें शुक्रिया ज़रूर कहूँगा..

ज़िन्दगी गाती हैं मर्सिया

सुर्ख होते सबेरे जैसे जलते अँगारे मायूसी की दीवारें बिखर जाती हैं खुशियाँ ज़िन्दगी गाती हैं मर्सिया शब्दों की सिलवटें नज़्मों की कराहटें दिल-धड़कन झूटे झूटे हैरत में हैं काफिया ज़िन्दगी गाती हैं मर्सिया सपनों का आँगन मर गया यौवन सुखा भादो सुखा सावन बैसाख जैसे हैं सदियाँ ज़िन्दगी गाती हैं मर्सिया   मैं जो हूँ तर-बतर शबो-सहर,आठों पहर अश्के-दिल या खूने-जिगर अपनी अपनी हैं कहानियाँ   ज़िन्दगी गाती हैं मर्सिया जिस्म के ताबूतों में बेजान बुतों में   दिखावटी रुतों में रूहों की हैं परछाइयां ज़िन्दगी गाती हैं मर्सिया उम्मीदों का मर्सिया सपनों का मर्सिया रिश्तों-नातों का मर्सिया हर लम्हा हैं मर्सिया ज़िन्दगी गाती हैं मर्सिया

त्रिवेणी (हिंदी ) -- क्र. १-४

त्रिवेणी क्र. १ >>> बारिश की बुंदे भी कितनी बेईमान होती है. बस कुछ लम्हो की यहाँ मेहमान होती है.. . . . . ये आंसू मुझसे बेईमान क्यू नही होते ??       पुणे, ६ मार्च, २०११  -------------------------------------------------------------------------------- त्रिवेणी क्र. २ >>> कहते हैं आदमी पढेगा, तो उन्नत होगा, विचारों का दायरा बढेगा.. सोच बदलेगी, सरहदें मिटेगी, दिल-से-दिल मिलेंगे.. . . . . . . हम तो अब फेसबुक पर भी ग्रुप्स में जीने लगे हैं -------------------------------------------------------------------------------- त्रिवेणी क्र. ३ >>> आज पापा घर जरा देर से पहुँचे.. मोबाइल का नेटवर्क जॅम था.. . . . . . वजह वोही थी, बस 'तारीख' नयी थी -------------------------------------------------------------------------------- त्रिवेणी क्र. ४  >>> एक ही गाडी  में बैठे  हम दोनों , मंजिल की तरफ बढ़ रहे थे.. और बंद खिड़की के बाहर खुबसूरत नजारों का सिल...

जी हाँ, मै एक आम आदमी हूँ..

जी हाँ, मैं एक आम आदमी हूँ अब आपको पता चल गया होगा देख के ताकद मेरे आवाज़ की अब आपका दिल जल गया होगा जी हाँ, मैं वो ही आम आदमी हूँ जो कल तक डरता-सहमता था हालात पे रोता, रोज मर के जीता था जिसकी आवाज़ सैकडों बार दबायी गई और हजारों बार जो छल गया होगा जी हाँ, मैं वो ही आम आदमी हूँ आपके घोषणापत्र में  जिसका चेहरा हैं आपके हर चुनाव में जो एक मोहरा हैं आज  मैंने भी अपनी एक चाल चली तो  आपका शतरंज हिल गया होगा जी हाँ, मैं एक आम आदमी  हूँ मैं प्रजातंत्र को बनाने वाली प्रजा  हूँ आप नहीं श्रीमान, मैं यहाँ का राजा हूँ आज मैंने अपना सिंहासन माँगा हैं तो आपका अभिमान ढल गया होगा जी हाँ, मैं एक आम आदमी  हूँ और मैं जानता हूँ ये देश मेरा हैं मुझसे ही नवनिर्माण का सबेरा हैं आप इस सूरज को छुपा नहीं सकते कोशिश में आपका हाथ जल गया होगा.. जी हाँ, मै एक आम आदमी हूँ अब आपको पता चल गया होगा.. देख के ताकद मेरे आवाज़ की अब आपका  दिल  जल गया होगा..        -- बे...

मैं गीत क्यूँ गाऊँ ?

गिद्धों के झुण्ड आते हैं जीवित देह नोंच चले जाते हैं आँखे बंद कर हम जी लेते हैं एक पत्थर भी ना उठा पाऊँ मैं गीत क्यूँ गाऊँ ? क्रुद्ध पवन रोज बहता हैं बेघर करता हैं, तन जलाता हैं ना ये मन हमारा व्यथित होता हैं एक नीड़ भी ना बना पाऊँ मैं गीत क्यूँ गाऊँ ? तिमिर यहाँ प्रतिपल होता हैं सूर्य पर विकट हँसता हैं हम भी तिमिर के साथ हो लेते हैं एक दीपक भी ना जला पाऊँ मैं गीत क्यूँ गाऊँ? बेरंग जगत के रंगरेज़ लोग मुखौटा पहने चालबाज़ लोग एक मुखौटा मैं भी पहना हूँ यह भी तो ना उतार पाऊँ मैं गीत क्यूँ गाऊँ ? खौफ़ के साये में रोज जीते लोग घर लौटे तो दीवाली मनाते लोग आज थोडा हँस के जी लेता हूँ क्या पता कल घर आ ना पाऊँ मैं गीत क्यूँ गाऊँ? ---- पुणे - ०३-०३-११ , बंगलोर - ०१-०५-११ ; १४-०७-११

मैं चला हूँ एक स्वर्ग के आवाहन में ...

मैं चला हूँ एक स्वर्ग के आवाहन में ... चाहे सपने अधूरे छूटे .. और आशाएँ दम तोड़ दें .. या कदम मेरे तिलमिला उठें.. और धीरज साथ छोड़ दें.. उजालें भी ना मिले छल के गगन में... मैं नहीं चाहता अप्सराओं का मनहर सुन्दर नर्तन.. मैं नहीं चाहता गन्धर्वों का दुर्लभ स्वर्गीय गायन.. और ना ही मेरी रूचि हैं अमृतपान में... हृदयों का सम्मेलन हो, जहाँ शुद्ध प्रेमभाव से.. आनंद का आन्दोलन हो, जब एक मिलें दूजे जीव से.. चाहे बुद्धि - गर्वित मानवदेह देना पड़े बलिदान में .. नयनो में प्रकाश भरा हो दशदिशा उज्जवल कर दें .. विश्वास हमारा खरा हो मनुष्यता सार्थक कर दे .. उत्साह की सरिता हर ह्रदय में और तन में .. चन्द्रमा की शीतलता से.. आतंकित ना कोई यौवन हो.. सन्नाटों की परछाइयों से.. भयभीत ना कोई तन हो.. हे देव, दे दो स्वर्ग जो था बृन्दावन में... माँ की लोरियों में.. जहाँ बच्चे सोते हैं.. एक नहीं हजार स्वर्ग उस आँचल में होते हैं.. हे देव, दे दो स्वर्ग हर माँ के आँगन में.. धरती पर ही था कहीं अब ...

राधा गुपचुप रोती हैं ..

सांय-सांय करती हवा, सिसकियाँ किसकी सुनाती हैं ? राधा गुपचुप रोती हैं... रासलीला में कान्हा तुम मगन थे, यमुना तट पे बहता पवन थे ना जाते द्वारिका तो क्या होता ? मनुष्य ही कहलाते तो क्या होता ? शाखा पर बैठी कोयल , क्यूँ विषाद-गीत गाती हैं ? राधा गुपचुप रोती हैं... मन माखन , तन माखन, नयनों से बहता द्रव भी माखन, याद कुछ दिला दूँ तुम्हें माखनचोर कहते हैं तुम्हें " माखन चुरा लो माखनचोर ", कौन यह विलाप करती हैं  ?   राधा गुपचुप रोती हैं... बंसी की धुनों में अब कौन बसता हैं ? शरारतों से तुम्हारी अब कौन हँसता हैं ? नटखट मुरलीमनोहर अब क्यूँ कहलाते हो ? अपने सुरों की मोहिनी जो नही फैलाते हो गायों की घंटियाँ उदास स्वरों में किस बछड़े को बुलाती हैं ? राधा गुपचुप रोती हैं... फ़िके हो गये होली के रंग देखो क्रिडा-रहित यमुनाजलतरंग देखो राधा अब भी यमुना-तट आती हैं श्याम वर्ण तुम्हारा आँखों में सजाती हैं   काजल सी काली कालिंदी, किसके आँसू बहाती हैं ?   राधा गुपचुप रोती हैं... प्रेम में भला क्यूँ यह बिरह-बेला होती हैं ? राधा गुपचुप रोती हैं ..

नया सूरज

 आज फिर धूप में चलें एक नये सूरज के तले ना कोई सीमा हो और`ना हो कोई बंधन हर घर अपना हो हर कोई हो स्वजन रंग रूप भाषा ना छले एक नये सूरज के तले द्वेष ना किसीके प्रति हर मन हो निर्मल भय में ना कोई जीएँ नेत्र ना कोई सजल प्रेम ही हर मन में पले एक नये सूरज के तले आशाओं के बादल संभावनाओं के सागर भरी रहें हर पल खुशियों की हर गागर ना हो हम संपूर्ण भले एक नये सूरज के तले ---नागपुर, २३-०२-२०१०