राधा गुपचुप रोती हैं ..

सांय-सांय करती हवा,
सिसकियाँ किसकी सुनाती हैं ?

राधा गुपचुप रोती हैं...

रासलीला में कान्हा तुम मगन थे,
यमुना तट पे बहता पवन थे
ना जाते द्वारिका तो क्या होता ?
मनुष्य ही कहलाते तो क्या होता ?
शाखा पर बैठी कोयल ,
क्यूँ विषाद-गीत गाती हैं ?

राधा गुपचुप रोती हैं...

मन माखन , तन माखन,
नयनों से बहता द्रव भी माखन,
याद कुछ दिला दूँ तुम्हें
माखनचोर कहते हैं तुम्हें
" माखन चुरा लो माखनचोर ",
कौन यह विलाप करती हैं  ?
 
राधा गुपचुप रोती हैं...

बंसी की धुनों में अब कौन बसता हैं ?
शरारतों से तुम्हारी अब कौन हँसता हैं ?
नटखट मुरलीमनोहर अब क्यूँ कहलाते हो ?
अपने सुरों की मोहिनी जो नही फैलाते हो
गायों की घंटियाँ उदास स्वरों में
किस बछड़े को बुलाती हैं ?

राधा गुपचुप रोती हैं...

फ़िके हो गये होली के रंग देखो
क्रिडा-रहित यमुनाजलतरंग देखो
राधा अब भी यमुना-तट आती हैं
श्याम वर्ण तुम्हारा आँखों में सजाती हैं
 
काजल सी काली कालिंदी,
किसके आँसू बहाती हैं ? 
राधा गुपचुप रोती हैं...

प्रेम में भला क्यूँ
यह बिरह-बेला होती हैं ?
राधा गुपचुप रोती हैं ..

१८ टिप्पण्या:

  1. सुपरफ़ास्ट प्रतिक्रियेसाठी सुपरफ़ास्ट सुपरधन्यवाद !!!!!!!

    प्रत्युत्तर द्याहटवा
  2. धन्यवाद हेरम्बदा !!!! आपके आशीर्वाद हैं !!

    प्रत्युत्तर द्याहटवा
  3. भिंतीवरल्या बाबा, खूप खूप आभार्स रे... तुझ्या काळजाला भिडली, कविता सफ़ल झाली म्हणायची..

    प्रत्युत्तर द्याहटवा
  4. राजे, तुमचे प्रोत्साहन मला नेहमीच लक्षात राहिल... अगदी मनापासून आभारी आहे.. :)

    प्रत्युत्तर द्याहटवा
  5. स्वामी,खुप सही झालीये कविता....आवडली....

    प्रत्युत्तर द्याहटवा

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