ग़ज़ल - कुछ ज़ख़्म हमारे ....
कुछ ज़ख़्म हमारे यूँ गहरे हो गये मरहम लगाया फिर भी हरे हो गये दोस्त साथ ना दें तो कोई ग़म नहीं दुश्मन अब जाँ से भी प्यारे हो गये नाता तोड़ चुकें बरसात से भी हम घर में आसुँओं के फ़वारे हो गये रेत के महल थे, ढह गये तो क्या ग़म सूरज की तपन के नज़ारें हो गये हिसाब भी क्या रखना बिती यादों का कुछ पल मेरे कुछ तुम्हारे हो गये तन्हाईयों से दूर भागते रहे ’संकेत’ अब उसी के सहारे हो गये