त्रिवेणी (हिंदी ) -- क्र. १-४

त्रिवेणी क्र. १ >>>



बारिश की बुंदे भी कितनी बेईमान होती है.
बस कुछ लम्हो की यहाँ मेहमान होती है..
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ये आंसू मुझसे बेईमान क्यू नही होते ??
     
पुणे,
६ मार्च, २०११ 

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त्रिवेणी क्र. २ >>>

कहते हैं आदमी पढेगा, तो उन्नत होगा, विचारों का दायरा बढेगा..
सोच बदलेगी, सरहदें मिटेगी, दिल-से-दिल मिलेंगे..
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हम तो अब फेसबुक पर भी ग्रुप्स में जीने लगे हैं


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त्रिवेणी क्र. ३ >>>

आज पापा घर जरा देर से पहुँचे..
मोबाइल का नेटवर्क जॅम था..
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वजह वोही थी, बस 'तारीख' नयी थी

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त्रिवेणी क्र. ४  >>>



एक ही गाडी  में बैठे  हम दोनों , मंजिल की तरफ बढ़ रहे थे..
और बंद खिड़की के बाहर खुबसूरत नजारों का सिलसिला चला.
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अक्सर ऐसे रास्तों पे ही तो हादसे हुआ करते हैं..
बंगुलुरु,
१८ सितम्बर ,२०११ 

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