’सोपा’ उपाय ??

’फुकट ते पौष्टिक’ च्या ’पिपा’सेला आळा घालणारा ’सोपा’ उपाय.

कथा - कारखान्यातले भूत

भुतांच्या अस्तित्व शोधण्याचा प्रयत्न करणार्‍या मुलाची कथा

पोएटिक लिबर्टी


ढिंगच्याक ढिंकच्याक पोएटिक लिबर्टी
कूल, हॅपनिंग, फ़ूल्टू डर्टी

आला आला श्रावण
झोपाळ्यामागे रावण
अमेरिकेची गार्‍हाणी
गणपत वाणी
सिग्गी पितांना
मॉलमध्ये फ़िरतांना
हाथों में हाथ
तेरा मेरा साथ
हाड हूड
कमॉन डूड
व्हॉट्स योर प्रॉब्लम ?
नेव्हर माइंड डियर
इट हॅप्पन्स हियर

अहाहा ! ते दृष्य पहा
मला पहा फ़ुले वहा
जीवन त्यांना कळले हो
कळले ते पाजळले हो
हो-हल्ला क्यूँ है भाई ?
किसकी मर गई माई ?
जीयो जी  भर के
एक और पराठा मख्खन मार के
हू वन दि मॅच ?
डन्नो, आय हॅव फ़्लाइट टू कॅच

केल्याने होत आहे रे
थांबल्याने मौत आहे रे
चला चला पुढे चला
पुढच्याच्या पुढे चला
समझौता करनेका नहीं
कुचल डालो,रुकनेका नहीं
छोटी बातों की चिंता छोड़ दो
भक्तगणों, गहरी साँस अंदर लो
डूड, इट्स क्वाएट ऍब्सर्ड
बट आय डू केअर अबाऊट दि वर्ल्ड

नवे-पुराणे
अधिक-उणे
साहित्याचा कागद
कागदावरचे साहित्य
भेळपुरी भेळपुरी !!
होता है अक्सर ऐसा
चाहिए प्रसिद्धी या फ़िर पैसा
सुबह घर से निकला था कोई
पर वो उसका घर था ही नहीं
व्हॉट मॉडर्निस्ट ? व्हॉट पोस्ट-मॉडर्निस्ट ?
दि होल वर्ल्ड इज ब्लडी अपॉर्च्युनिस्ट !

अहा ! काय मस्त वाटतंय आता !! अहा !
गार गार ! फ़ुल पगार !!
भेजा बिल्कुल साफ़ 
सब गुनाह माफ़
ढिंगच्याक ढिंकच्याक पोएटिक लिबर्टी
कूल, हॅपनिंग, फ़ूल्टू डर्टी


---- पुणे  
२८ मार्च, २०१३

... अच्छा हुआ

अब के अकाल रहा, अच्छा हुआ
जीना मुहाल रहा, अच्छा हुआ

कुछ ना अवाम कहें, अच्छा नहीं
थोड़ा बवाल रहा, अच्छा हुआ

कोई जवाब मिले या ना मिले
कोई सवाल रहा, अच्छा हुआ

सब के जवाब दिए सरकार ने
मेरा सवाल रहा, अच्छा हुआ

कोई मुराद पुरी करते अभी
थोड़ा मलाल रहा, अच्छा हुआ

राहत मिलें न मिलें, चर्चा रहा
भाषण कमाल रहा, अच्छा हुआ

’अपने नसीब खिले’ , उसने कहा,
’ अब के अकाल रहा, अच्छा हुआ’


--- पुणे,
१८ मार्च, २०१३

बोलीले जित्ता ठेवा, मराठीले जित्ता ठेवा


मराठी भासेची खासबात काये जी ? असा तुमाले कोनी विचारलनच तं सांगजाल का इच्या बोल्या ! अजी एखाद्या भासेच्या ४२ बोल्या मंजे तुमाले मज्याक वाट्ते का जी ? असी बोल्याइच्या बारेत अमीर भासा मराठीच आये, हिंदी बी नसे अना बंगाली-तमिल-तेलुगु बी नसे. मंग आप्ल्याले अभिमान पायजे का नाई ? अखिन बोल्याइमंदी बी पोटबोल्या आयेतंच.. आता आमच्या झाड़ीबोलीचाच घ्या ना जी. म्हनावाले गेला तं इनमिन ४ जिल्ल्यात बोलतंत, पर असी अमीरी आये भाऊ का , का सांगू तुमाले. भंडार्‍याची(  मराठीतला पयला ग्रंथ, ’विवेकसिंधु’ मुकुंदराजाने भंडार्‍यातच ’आंभोरा’ गावी संगामावरच्या पहाडीवर बसून लिखला. ) अलग, गोंदियाची अलग ,चंद्रपुराची अलग अन गड़चिरोलीची अलग. पर आये झाड़ीबोलीच. तेच मिठास; जरा सब्द अलग, जरा बोलाचा ढंग अलग आये तं का झाला ? पर काही कम-अकलीच्या मानसाइले वाट्ते का झाड़ीबोली मतलब गावठी लोकायची बोली. मराठीत लमड़ीचे हिंदी घुसाडून बोलतंत. मंग आमाले बी वाटत रायला का हंव भाऊ, हे सिकले-सवरले सयरातले लोकं मन्तेत तं सहीच बात असंल. मंग आमी बी कायले झाड़ी बोल्तो जी ? ते घरी अना दोस्तभाइसंगच बोलावाले वापरतो. पुन्यात गेलो तं आमची अखीनच पंचाइत ! मंग आमी सिद्दा हिंदीतच बोल्तो. मंग तिकड़्ले काही जन बोल्तंत का हे लोकं मराठीत नाइ बोलतं. तुमी हासना बंद करा तं आमीबी मराठीत बोलून ना जी ! स्यारेत बी झाड़ीत बोलला का सर-म्याड़म हातावर सन्नान सड़ी घुमवतंत. मी पाचवीत होतो तईची गोठ सांगतो तुमाले.. माया वर्गातला एक पोट्टा म्याडमले उत्तर देउन रायला होता तं ’हव’ मनलंन तं म्याडम म्हन्ते का ’ हव’ नाही ’हो’ म्हनाचा. ’हव’ असुद्द आये. आता भाऊ माले सांगा झाड़ीबोली तेवडी असुद्द अना परमान बोली तेवडी सुद्द असा कइ होते का ? माया तं मनना आये का मराठीच्या सप्पाच्या सप्पा बोल्याइचे सब्द प्रमान मराठीत आनले तं मराठी असी अमीर भासा बनंल का , का सांगू तुमाले. आता पाहा ना जी, तुमी ’छिद्र’ मन्ता त्याले आमी तो कसा आये हे पावुन ’सेद’ मनावचा का ’दर’ मनावचा हे पायतो. अजून एक मज्या सांगू का भाऊ, तुमी ’साप’ मन्ता तं आमी त्याले ’सरप’ मन्तो; मंजे सन्स्कृतचा ’सर्प’ अखीनबी आमी वापरतो. ’करावले काये ना धोंड्या सरप खाये’ असी एक म्हन बी आये आमच्यात. परमान मराठीत ’बेडूक’ आहे, आमी त्याले ’भेपका’ मनून अगर का तो मोटा असंल, मतलब ’टोड’ वर्गातला असंन तं, नाई तं ’भेपकी’ बी आये ना ’मंडोडरी’ बी आये.( ’फ़्रॉग’ वर्गातला असंन तं ). परमान मराठीत हेवाले सब्द काऊन नाइ आनत?
झाड़ीबोलीचा उदाहरन देल्लो कावून का हे माही बोली आये. पर असी पतली हालत तं मराठीच्या सप्पाच बोल्याइची आहे जी. सिकले सवरले लोकं बोल्याइले अनपड अनं गावठी लोकाइअची समजतंत. सयरात गेले का परमान बोलावची कोसिस करतंत. करा, बोला बी, मी त्याले नाइ नाइ मनत, पर आपल्या बोलीले विसरावाचा नाइ. आता मी का पुन्यात एकदम असली झाड़ी बोल्लो तं तेतल्या लोकाइअले समजलंच नाइ. परमान मराठीचा तोच मतलब आहे. महारास्ट्रातले दोन मराठी मानूस कोटीबी भेटले तं एकमेकाइसोबत बोलावले अड़चन नाइ आली पाइजे. पर याचा मतलब असा नाइ का दुसर्‍याच्या अना खुदच्याबी मायबोलीले नाव ठेवजाल, अना फ़क्त परमान मराठीचाच तुनतुना वाजवाल, हव का नाई ? मराठीतलेच कई सब्द आता वापरातून जाउन रायले आयेत. बोल्याइचे जतन करावले नाइ पायजे का ? तुमीच सांगा ! तं माले असा मनावाचा आये का आपन आपापल्या बोल्याइत बी लिखावाचा, आपल्या पट्ट्यातल्या लोकाइसोबत आपल्याच बोलीत बोलावचा, आपले सब्द वापराचे, दुसर्‍या भागातल्या लोकाइसोबत बोलावाले पर परमान मराठी वापरावाची. जमला तं धीरेधीरे परमान मराठीत बी आपापल्या बोल्याइतले बढियावाले सब्द आनाचे अना मराठी अमीर करून टाकाची.
मराठीच्या ४२ बोल्या , तेच्यातली बी एक बोली परमान, मंजे राहून रायल्या ४१ बोल्या. तं या ४१ बोल्याइतले सब्द, तेच्यातबी ज्या सब्दाइले परमान मराठीत बेस सब्द नसे तेच्यासाठी वापराले सुरुवात केली तं कितीक चांगला होउन जायल , सोचून पाहा जरा. अना येच्यासाठी पयले सप्पा बोल्याइचा एक बढिया सब्दकोस बनवाचा. जई मी पुन्याले आलो तई माही बहोत पंचाइत होऊन गेली होती. ’पोपट’ नावाच्या भाजीले येती ’ पांढरे वाल’ मन्तंत नाइ तं ’पावटा’ मन्तंत अना आमचा ’मिठटू’ नावाचा पक्षी येती ’पोपट’ बनला. मी ’पोपट’ मांगलो तं मन्ते का येती भाज्या भेटते ! मी मन्लो का हव मी भाजीच मांगत आहो. मंग मने का हे कोन्ती भाजी भाऊ ? मंग मी बोट दावून सांगलो का ते वाली. मंग ते सांगते का यिले आमी अलाना-फ़लाना मन्तो, कोटचे भाऊ तुमी ? ’सांभार’ मांगावले जावा तं मन्ते का भाउ हाटेलात जा ! आता सांभाराले ’कोथिंबीर’ मन्तंत आमाले का मालूम ? आमची असी होते गम्मत नं तुमाले वाटते मज्याक ! मनून मी मन्तो का असा सप्पा बोल्याइचा एक कोस पायजे.( मी ’सब्दाइचा’ कोस मनून रायलो नाइ तं तुमाले वाटल ’सापाची’ कोस ! ) आता इन्टरनेट आये, जालाची दुनिया आये, येती तं काम बोहोतच सोपा झाला आये जी. मंग कराची का सुर्वात ?
जागतिक मराठी भास्यादिनाच्या तुमाले बोहोत सुभेच्छा !


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टीप :
 झाड़ीबोलीत श, ष, छ , ण, ळ नाहीत. श, ष, छ करिता ’स’ वापरले जाते. ’ण’चा उच्चार ’न’ होतो, ’ळ’ चा उच्चार ’र’ होतो, निमशहरी झाड़ीबोलीत मात्र ’ळ’ चा अनेकदा ’ड़’(’सड़क’चा ’ड़’) सारखा उच्चार केला जातो. 

नया मसीहा ना भेजियो

आज सुबह जब ख़बर आई की तिंबक्तू की अहमद बाबा इन्स्टिट्यूट को इस्लामी दहशतग़र्दों ने जला दिया हैं, तो मैं विकल हो उठा । इस संस्था में ३०,००० से अधिक सैकडों वर्ष पुरानी पांडुलिपीयाँ जतन कर रखी थी । और यह सब इस्लामी सुवर्णयुग की एक अनमोल धरोहर थी । क्या नहीं था इन में ? इस्लाम की बातें, कु’अरान की टिपणींयाँ, खगोल,रसायन, गणित की क़िताबे थी !
आक्रमनकारियों द्वारा किताबें जला देना कोई नई बात नहीं, सदियों से यह होता आया हैं । दुसरों की सभ्याता के प्रतिकों को, ज्ञान को नष्ट करनें का सबसे आसान तरिका यहीं होता हैं । भारत में भी हुआ हैं । अपने महान भारत में , जिसे हम ’सहिष्णू’ देश कहते हैं, यहाँ भी कट्टरपंथीयों ने लोकायत(चार्वाक)दर्शन के ग्रंथ नष्ट कर दिए, जो नास्तिकवाद या जड़वाद का दर्शन था । आज चार्वाकदर्शन केवल दुसरे दर्शनों के संदर्भ में मिलता हैं । लेकिन यह सब विरोधी विचारधाराओं को दबा देने के होता था । तिंबक्तू में ऐसा नहीं हुआ । इन्हें जलाया गया क्यूंकि कट्टरपंथीयों ने माना की ये ’ग़ैर-इस्लामी’ है ! अरे भई, जो ज्ञान इस्लामी विद्वानों ने इज़ाद किया था, जो इस्लाम के बारे में था, जिस में शायद पुरानी कु’अरान की, हादिथ की पांडुलिपीयाँ भी शुमार थी , जिसे इस्लामी सुलतानों ने पनाह दी, प्रोत्साहन दिया हो, वह सब आज इस्लामविरोधी कैसे हो गया ? 
कुछ ही महिनों पहले(अक्तूबर, 20१२), सलाफ़ीयों ने(इस्लामी उग्रवादीयों का एक संगठन) मोरोक्को के ’आठ हज़ार वर्ष पुरा्ने” पाषाण पर कुरेदे गये सूर्य के चित्र को नष्ट कर दिया गया था, क्योंकि वह बुतपरस्ती की निशानी थी और इस्लाम बुतपरस्ती की इजाज़त नहीं देता. आज मोरोक्को इस्लामी मुल्क है, वहाँ बुतपरस्ती नहीं होती.अब क्या ज़रूरत थी इसे नष्ट करने की ? वह स्टोन कार्विंग एक अनमोल ऐतिहासिक धरोहर थी. इन सलाफ़ीयोंने बेवज़ह इतिहास हा एक पन्ना नष्ट कर दिया. कुछ वर्ष पूर्व बामियान की बुद्धमूर्ती को भी तालिबानियों द्वारा नष्ट कर दिया गया था । इन दोनों मसलों में समझा जा सकता कि, चूँकि ये क़ाफ़िराना निशान थे, सो इन्हें तबाह कर दिया गया । पर तिंबक्तू की पांडुलिपीयाँ क्यूँ ? 
तिंबक्तू अपनी पांडुलिपीयों के लिए विश्वविख्यात है । सैकडों वर्ष पुरानी लाखों पांडुलिपीयाँ जतन करने की वहाँ परम्परा रहीं है । विद्वानों के लिए तिंबक्तू हमेशा एक पनाहगाह रहा है ! पांडुलिपीयों की देखभाल करने वालों को वहाँ विशेष आदर से देखा जाता हैं । तकरीबन दो साल पहले तिंबक्तू की इस धरोहर के बारे में एक विस्तृत लेख ’ नॅशनल जिओग्राफ़िक’ मासिक में आया था । अपनी धरोहर की हिफ़ाज़त करने की तिंबक्तू की अवाम की जद्द-ओ-जोहद क़ाबिल-ए-तारिफ़ थी । और आज कुछ उग्रपंथीयों ने उनकी मेहनत पर पानी फेर दिया । अपनी ही सभ्यता के निशान मिटाना कब से इस्लामी हो गया ? अगर आप कु’अरान का लिखा ही सच मानते हो और उसी को आधार मानकर हर क़दम उठाते हो, तो बताइएँ कि, किस सुरा , किस आयत में लिखा गया हैं कि, शरि’आ लाने के लिए क़िताबें तक जला डालो ? और वह भी अपनी ही मज़हबी धरोहर ?
अगर ये कट्टरपंथी समझते हैं की दुनिया के सारे मज़हब और फ़िरकों को मिटा देने से और केवल इस्लाम लाने से (वह भी इनका वाला इस्लाम ) दुनिया में अमन कायम हो जाएगा, तो माफ़ किजीएगा हज़ूर, आप ग़लत है । आदमी फ़िरकापसंद है । हमें खुद को फ़िरकों में बाँटना पसंद हैं । पैग़म्बर महम्मद ने इतना साफ़-साफ़ कहा हुआ इस्लाम भी अगर फ़िरकों में बँट सकता है, तो फ़िर से सारी इन्सानियत को एकही फ़िरके तले लाने की कोशिशें फ़ानी है । जैनों के दो फ़िरके बनें- श्वेतांबर, दिगम्बर । बौद्ध धम्म के तीन फ़िरके बनें- महायान, हीनयान, वज्रयान(तंत्रयान) । इस्लाम में भी कई हैं - शिया, सुन्नी,बोहरा,इस्माईली, ज़ैदी,सूफ़ी वगैरा । ख़्रिश्चियानिटी के तो गिन भी नहीं सकते ।
चलो फ़र्ज़ किजीए कि सारी दुनिया में इन का मनचाहा इस्लाम कायम हो गया, बाकी मजहबों के, फ़िरकों के सारे निशानात मिटा दिए गए, हर तरह की इबादतगाहें, मिटा दी गई, शरि’आ लागू हो गया... कितने दिन-महिने-साल कायम रहेगा ? हम फ़िरकापरस्त है, फ़िरकापसंद हैं, इस इस्लाम में भी कोई फ़िरका तयार हो जायेगा, और फ़िर से मजहब के नाम पे खून बहाना शुरू किया जाएगा । दुनिया में एक ही धर्म आ जाने से शांती कायम नहीं होती । बेहतर है की सारे धर्मों को अपने घर में ही रखा जाए, कोई किसी के धर्म में टाँग न अड़ाएँ । जिओ और जिने दो । ’मेरा मज़हब ही सर्वश्रेष्ठ हैं’ यह आग्रह क्यों ? और अपनी बात मनानें के लिए सामनें वाले का गला घोंट देना ? जिसे जो पसंद हो वह उसे करने क्यूँ नहीं देते ? नास्तिक आदमी पाषाणपूजक को यह क्यों कहता हैं कि भय्या इस पत्थर को क्यूँ पूजते हो ? रोज सुबह भगवान के सामने दिया जलाने वाला नास्तिक से ये क्यों कहता है कि, भय्या तुम भगवान में आस्था क्यूँ नहीं रखते ? ख्रिश्चन हिंदू को यह क्यों कहता हैं, कि भाई मंदीर में नहीं, चर्च में आओ ? वैष्णव शैव को यह क्यों कहता हैं कि, शिव की नहीं, कन्हैया को भजो ? कोई किसीको किसी के धर्म के बारे में सवाल पूछना बंद ही क्यों नहीं करता ? ऋषभदेवजी आए, मूसा मसीह आए, वर्धमान महावीर आए, गौतम बुद्ध आए, इसा मसीह आए, पैगम्बर महम्मद आए, नानक आए, सबने वोही शांती-भाईचारें का संदेश दिया, कुछ फ़र्क पड़ा ? हम तो भय्या लड़ते रहे थे, लड़ते रहे हैं, लड़ते रहेंगे । और जितने ज़्यादा मजहब आएँगे, उन में से उतने ही ज़्यादा फ़िरके(पंथ) बनेंगे, और लड़ाई-झगड़ो की तादाद भी उतनी ही बढ़ेगी ।
अब हे भगवान,अल्लाह गॉड  मेहरबानी कर के कोई नया मसीहा ना भेजियो ।

निबंध :-- माझे आवडते पक्वान : हलवा

हलवा माझे आवडते पक्वान आहे. तसे ते अनेकांचे आहे, पण माझे विशेष आहे. आता विशेष म्हणजे खास आहे. खास ह्या शब्दातच ’खा’ असल्याने हलवा जास्तच खाल्ला जातो. हलवा अनेक प्रकारचा असतो.मला गाजराचा जास्त आवडतो. तसा तो अनेक मोठ्या हिरोंना पण आवडतो. हिरोला त्याची आई खूप आवडत असते. मात्र हिरोची आई हलवा विशेष प्रसंगी बनवते. पण आमची आई कधीही हलवा बनवते, म्हणून मला माझी आई हिरोच्या आईपेक्षा जास्त आवडते. हलव्याचे दागिने बनतात. मला हलव्याचे दागिने आवडतात.आईला मात्र सोन्याचेच दागिने जास्त आवडतात. बाबांसाठी आईच एक दागिना आहे. ताईचे दागिने विचित्र असतात. संस्कृतच्या गुरुजींनी, ’लज्जा हा स्त्रीचा दागिना आहे’ ह्या अर्थाचे सुभाषित शिकवले होते. ’म्हणजे ’लज्जा’ हा तस्लिमा नसरीनचा पण दागिना आहे का गुरुजी?’ हा प्रश्न विचारल्याबद्दल मला बाकावर का उभे केले गेले ह्याचे उत्तर मात्र गुरुजींनी दिले नाही.मात्र तरीही मला गुरुजी आवडतात कारण संस्कृतमध्ये खूप मार्क मिळतात. मात्र गुरुजींना गणिताच्या अवचट बाई आवडतात.गणित मला नाही आवडत कारण बाई नेहमी ’समजा तुमच्याकडे १०० रुपये आहेत, दहा सफरचंदे आहेत’, असे म्हणत असते, पण प्रत्यक्षात काहीच देत नाही. बाईला माझे प्रश्न आवडत नाही.  हौदाला भोक आहे तर तो बुजवण्याऐवजी तो किती वेळात रिकामा होईल ह्याचे उत्तर का शोधायचे ? एकदा ’हौद किती वेळात भरला ? ’ ह्याचे उत्तर मी ’नळ लवकर गेला.’ असे दिल्यामुळे बाईने मला कोंबडा बनवले होते. मी शाकाहारी असल्याने मला ते आवडले नव्हते. हलवा शाकाहारी पदार्थ आहे. मात्र हलव्यावर मागच्या बाकावरची मुले मांसाहारी विनोद करतात. मला ते आवडत नाही. मी करतो का चिकन टिक्क्यावर शाकाहारी विनोद ? ’हलवणे’ म्हणजे 'हलवा बनवणे' हा वाक्प्रचार मराठी भाषेत आणायला पाहिजे. मराठी माझी मातृभाषा आहे, पण मातृभाषा हा शब्द मात्र संस्कृत आहे. मराठी संस्कृतापासून आली असे संस्कृतचे गुरुजी म्हणाले होते. मात्र माझा मामा म्हणतो की मराठी प्राकृतापासून आली आहे. मामा विद्वान आहे, म्हणून मला तो आवडतो. मात्र त्याला पुस्तके आवडतात. ’चुलीत घाला तुमची पुस्तके !’ अशी मामी मामाला आज्ञा करते, मात्र तो पाळत नाही. आमचा जिमी आमची प्रत्येक आज्ञा पाळतो.त्याला शेजारच्या रेड्डींची डॉली आवडते. रेड्डींची स्वाती डॉलीला बागेत घेऊन येत असते. मग मीही जिमीला बागेत घेऊन जातो.मला स्वाती आवडते. मात्र तिला चॉकलेट बॉईज आवडतात. आमीर खान चॉकलेट बॉय आहे म्हणून मला तो अजिबात आवडत नाही. स्वाती मला लाडाने हवला म्हणते. मला हलवा आवडत असल्याने म्हणत असेल. पण यस.यम. रामारावांचा वेंकट म्हणतो की तेलुगूत ’हवला’ म्हणजे ’वेडा’, पण माझा त्याच्यावर विश्वास नाही. विश्वासबाबू आमच्या सोसायटीचे कोषाध्यक्ष आहेत. ते बंगाली आहेत. मी त्यांच्या घरी गेलो की, मला रसगुल्ला देतात, म्हणून मला विश्वासबाबू आवडतात. मात्र विश्वासकाकू बसवून त्यांचे वीणावादन ऐकवते, ते मला आवडत नाही. त्यांना मी हलव्यात तुरटी मिसळून देणार आहे. हलव्याचे अनेक फायदे आहेत. म्हणून मला हलवा आवडतो.

ये ज़मीं हैं सितारों की

हम कहें क्या कहानी अजी , बदगुमाँ इन बयारों की
जब समझ ही न पाए ज़ुबां, आज भी यह इशारों की

चंद बूँदें लहू की गई , तो क़यामत नहीं आई
तलब तो मिटेगी सही, कुछ लहू के बिमारों की

अब यहाँ जिस्म तो बिक गया, मोल तो हो अनाजों का 
ये कहानी नहीं काफिरों , हैं हकीकत बज़ारों की

बख्श दो फिसल जो हम गए, आपकी आशिकी में यूँ
कुछ खता तो हमारी रही, कुछ रही इन बहारों की

आज अखबार पढ़ के मुझे, ये पता तो चला यारों
ये नहीं अब हमारी रही, ये ज़मीं हैं सितारों की 

'मर्ढेकरांची कविता' : बेकलाइटी नव्हे, अस्सल !

पृथ्वीची तिरडी
(एरव्ही परडी
फुलांनी भरली !)
जळो देवा,भली !!
...कविता संपली आणि वर्गात शांतात पसरली. 'प्रेमाचे लव्हाळे ’या कवितेचे वर्गात वाचन सुरु होते. बारावीला सगळे विषय केवळ गुणांच्या आकडेमोडीत अभ्यासले जातात. मराठी काही अपवाद नव्हे, त्यामुळे अभ्यासक्रमाला असलेल्या कवितादेखील परीक्षेनंतर लक्षात राहत नाही की मनावर परिणाम सोडत नाही. या कवितेबाबत मात्र काही वेगळे घडले. मर्ढेकर या कवीचे 'नव्याने' ओळख झाली.
बाळ सीताराम मर्ढेकर नावाच्या जादूची ओळख झाली ती त्यांच्या 'गणपत वाणी बिडी पितांना' ह्या कवितेतून. पुढे अजून एक कविता वाचनात आली, ' पिपांत मेले ओल्या उंदीर'. ह्या दोन्ही कविता शाळकरी पोरवयात वाचलेल्या होत्या. तेव्हा 'आधुनिक कविता' वगैरेंची फारशी मैत्री नव्हती, बालकवी,केशवसुत, कवी बी, ह्यांच्यापलीकडे झेप घेतली नव्हती. त्यामुळे ह्या दोन्ही कविता मला कितपत कळल्या होत्या ठाऊक नाही.फार भारावून जाणे अशातला प्रकार घडला नव्हता. शाळेला पाठ्यक्रमात मर्ढेकरांची पहिल्यांदा कविता अभ्यासाला आली, 'पितात सारे गोड हिवाळा'. मुंबईच्या हिवाळ्यातील पहाटेचे एक चित्रदर्शी पण नेहमीच्या वर्णनापेक्षा काहीसे हटके चित्रण होते.हा कवी वेगळा आहे ही जाणीव पहिल्यांदा झाली. 'भारावून जाणे' म्हणजे काय असते हे मात्र 'प्रेमाचे लव्हाळे ’या कवितेने जाणवले. द्वितीय महायुद्धाच्या पार्श्वभूमीवर ही कविता लिहिली होती. 'मर्ढेकर' अभ्यासायला हवा हे मनात आले. 'मर्ढेकरांची कविता' हे छोटेखानी पुस्तक वाचनालयातून आणले.
mardhekaranchi_kavita.jpg
'मर्ढेकरांची कविता' हा संग्रह म्हणजे त्यांच्या हयातीत प्रकाशित झालेल्या तीन कवितासंग्रहांचे(शिशिरागम,काही कविता, आणखी काही कविता ) आणि मोजक्याच(एकूण ९) अप्रकाशित कवितांचे संकलन आहे.
'शिशिरागम' मधील कविता रविकिरण मंडळाशी इमान राखणाऱ्या आहेत, तरल आणि भावप्रधान. बहुतेक कविता 'सुनीत' वृत्तात रचल्या आहेत.
" सूर कशाचे वातावरणी ?
सळसळ पानांची ? वा झरणी ?
खळखळ, ओहोटीचे पाणी ?
किलबिल शिशिरी केविलवाणी ?
कुणास ठाऊक ! डोळयां पाणी
व्यर्थ आणता; नच गार्‍हाणी
अर्थ; हासुनी वाचा सजणी
भास !- जरी हो खुपल्यावाणी.
या कवितेने काव्यसंग्रहाची सुरवात होते. कवितांना शीर्षक नाहीत, क्रमांक आहेत. 'शिशिरागम' ही पहिली कविता. बहुतेक कविता या शृंगाररसातील आहेत. चित्रदर्शी आणि गेय आहेत,बालकवी किंवा गुरुदेव ठाकुरांची आठवण करून देणार्‍या.
उदा.
" माळावरल्या बांधावरती विलोलनयना जरा
थांबली कटी ठेवुनी करा "
किंवा
" वाचन-मग्न पर्णकुटीच्या दारि उभी टेकुनी
कपोला अंगुलीवर ठेवुनी "
ही कविता.
" कोणी नको अन काही नको, देवता तू एकली !
हृदय जीते अर्पिले हे होऊनी बद्धांजली ! "
अशा प्रेयसीला देवतेच्या स्थानी ठेवणाऱ्या कविताही आहेत.(ज्या प्रकाराची आचार्य अत्र्यांनी थट्टा उडवली होती.)
एकूण वीस कवितांचा हा संग्रह खरेतर 'अमर्ढेकरी' आहे. पहिलाच काव्यसंग्रह म्हणून कदाचित मर्ढेकरांनी धोका पत्करला नसावा असे वाटत राहते.
दुसऱ्या काव्यसंग्रह आपण एक नवा काव्यप्रकार मराठी साहित्यात आणत आहोत ह्याची त्यांना जाणीव होती, हे त्याच्या प्रास्ताविकात दिसून येते. त्यांनी या काव्यसंग्रहाचे नाव 'कांही कविता' बुद्ध्याच ठेवले असावे हेदेखील लक्षात येते.
"
'शिशिरागम' प्रसिद्ध झाल्याला आठ वर्षे झाली. त्यानंतरच्या ह्या पाचपन्नास कविता.
शब्दांवर थोडी हुकमत असली आणि लय तोंडवळणी पडली म्हणजे कविता लिहिणं फारसं कठीण नसतं. त्यापलीकडे काही पुढील लिखानांत आहे किंवा नाही हे वाचकाच ठरविणार. त्यांचं मत अनुकूल पडलं नाही तर लेखकाने योग्य तो बोध घ्यावा. पण 'भूमिके'चा टोप चढवून आणि तळटिपांचे पैंजण घाकून नकटीला शारदेचे सोंग घ्यायला लावणं हा त्यावर तोडगा खास नाही.'
"
ज्ञानदेव- तुकारामांनी क्रांती घडवून आणायला ओव्या-अभंगांचा वापर केला.मर्ढेकरसुद्धा 'कांही कविता'ची सुरवात अभंगाने करतात,हा योगायोग नव्हे. आधुनिकतेचा साज लेउनी आलेल्या अभंग-ओव्या हे या काव्यसंग्रहाचे वैशिष्ट्य ! नमनालाच
माझा अभंग माझी ओवी | नतद्रष्ट गाथा गोवी,
इंजिनावीण गाडी जेंवी । घरंगळे ॥
कुठे ज्ञानेश्वर श्रेष्ठ | कुठे तुकाराम पवित्र,
कुठे समर्थ धीरोदात्त| संत सर्व ||
संत शब्दांचे नायक | संत अर्थांचे धुरंदर ;
एक शब्दांचा किंकर | डफ्फर मी ||
ही कविता आहे. या कवितेतून असे वाटते की या नव्या उपक्रमाबद्दल मर्ढेकर थोडे साशंक असावेत. ते शेवटी म्हणतात,
अहो शब्दराजे, ऐका । लाज सेवकाची राखा;
नाही तरी वरती काखा । आहेत ह्या ॥
"कांही कविता"तील कविता उघड्यानागड्या आहेत, रोखठोक आहेत,उपहासगर्भ आहेत, दुसर्‍या महायुद्धाच्या क्रौर्याचा परिणाम इथे दिसेल नि मुंबईतील चाकरमान्यांच्या जीवनशैलीतील अपरिहार्यावर केलेले भाष्यही दिसेल. इथे प्रतिमांचा मुक्त वावर आहे.शब्दांची नाविन्यपूर्वक योजना आहे, इंग्रजी शब्दांचा आणि मराठी काव्यपंक्तींचा कल्पकतेने केलेला वापर आहे. पुढे जी ’मर्ढेकरी शैली ’म्हणून ओळखली गेली तिचा प्रत्यय "कांही कविता"त येतो.
लेखाच्या सुरवातीला आलेली 'प्रेमाचे लव्हाळे' ही या काव्यसंग्रहातील पहिली कविता. दुसऱ्या महायुद्धाची भीषणता, त्यातून दिसलेली संवेदनाहीनता ह्यांचे दर्शन करवणारी ही कविता.
" प्रेमाचे लव्हाळे '
सौंदर्य नव्हाळे,
शोधूं ?
-आसपास "
असा सवालच मर्ढेकर करतात.
दुसऱ्या अभंगरूपी कवितेत मर्ढेकर म्हणतात,
" अज्ञानी जनांस | ज्ञान पाजू नये
मारुनी उरावे | धडरूपे ||
दे गा हेची दान | देवा, माझी हाडे
खाउनी गिधाडे | तृप्त व्हावी ||
तिसरी कविता म्हणावी तर तुकारामांच्या 'जे का रंजले गांजले' चे विडंबन आहे, म्हणावी तर राजकारणाच्या खालावत्या स्तरावर केलें प्रहर आहे.
" जे न जन्मले वा मेले | त्यांसी म्हणेजो अपुले,
तोचि मुत्सद्दी जाणावा | देव तेथे ओळखावा ||
मोले धाडी जो मराया | नाही आंसू आणि माया
त्यासी नेता बनवावे | आम्हां मेंढरांस ठावे ||
पाकिस्तानच्या मागणीवरून उसळलेल्या दंगलीवर केलेले,
"कां हो माजवितां दुही । माखतां स्वातंत्र्याची वही
स्वजनरक्ताने प्रत्यहीं । लळथळां ॥ "
खरे तर "कांही कविता"तील कवितांविषयी इतके काही सांगण्यासारखे आहे की प्रत्येक कवितेवर स्वतंत्र लेख व्हावा. मर्ढेकरांनी योजलेल्या काही शब्दरचना थेट अंगावर येतात.
’विज्ञान-उणे-माणुसकी’ वर भाष्य करणारी,
" जाणे शुद्ध शुचिर्भूत ।एक प्रायोगिक सत्य ,
जरी त्याचेंच अपत्य । हिरोशिमा ॥
किंवा
संवेदनाहीनतेवर भाष्य करणारी
" गळे अश्रूंवीण चरबी । तीच अज्ञानाची छबी ;
झाले ते खत आणि बी | तुझ्या मळां ॥ "
किंवा
" टिर्‌र्‍या अर्धपोट ।जोवरी आहेत,
ओंगळ समस्त । आम्ही नंगे ! ॥ "
"पिपांत मेले ओल्या उंदिर" ही या काव्यसंग्रहातील एकविसावी कविता. प्रथम ’अभिरुचि’ मासिकात प्रकाशित झालेल्या या कवितेने घडविलेला इतिहास सर्वज्ञात आहे. ह्या कवितेत वापरलेल्या प्रतिमांचा मागोवा घेणे मनोरंजक ठरते. नाझी छळछावण्यांतील ज्यू कैदीं की गिरणी कामगार ? हे द्वंद्व बाजूला सारले तरी दोहों अर्थांनी कविता सखोल परिणाम करणारी ठरते.
गिरणी कामगारांच्या जीवनशैलीचे चित्र चितारतांना,
काळ्या बंबाळ अंधारीं
धपापतें हें इंजिन;
कुट्ट पिवळ्या पहाटीं
आरवतो दैनंदिन
भोंगा.-
"घन:श्यामसुंदर श्रीधरा गिरिणोदय झाला,
उठि लवकरि दिनपाळी......"

- गोंगाटला सारा
कामगारवृंद आणि
कोंबटशा पिळी धारा
अशी रचना मर्ढेकरच करू शकतात.
"आणखी कांही कविता" हे "कांही कविता"चाच पुढचा भाग आहे म्हणायला हरकत नाही.
मर्ढेकरांच्या आधुनिक कविता जेव्हा प्रकाशित होऊ लागल्या होत्या, तेव्हा त्या अनेकांच्या पचनी पडल्या नव्हत्या. त्यांच्या कवितेची साहित्यवर्तुळात बरीच टर उडवण्यात आली होती. दुर्बोधतेचे आणि अश्लीलतेचे आरोपही ठेवण्यात आले होते. ह्या सार्‍या घडामोडींचे प्रतिबिंब "आणखी कांही कविता"त उमटते.
"काळ्यावरती जरा पांढरे
ह्या पाप्याच्या हातुन व्हावे
फ़क्त तेधवा:आणि एरव्ही
हेंच पांढर्‍यावरती काळें ! "
ह्या ओळींतून
किंवा
" भंगुं दे काठिन्य माझें
आम्ल जाऊं दे मनीचें;
येउं दे वाणींत माझ्या
सूर तुझ्या आवडीचे " या कवितेतून त्याची साक्ष पटते.
"आणखी कांही कविता" "कांही कविता"पेक्षा अधिक भेदक आहे. आशय, प्रतिमांचा वापर ह्याबाबत अधिक मर्ढेकरांची प्रतिभा अनेकविध अंगांनी बहरते.
एकूण पस्तीसच कविता असल्या तरी प्रत्येक कविता अगदी बावनकशी आहे. इथे आपण हरखून कवितांचा आस्वाद घ्यायचा आहे. एकेका कवितेअंती आपल्या जाणीवा विस्तारत जातात. त्यांच्या कविता वाचतांना कुठेकुठे बांग्ला आधुनिक कवी आणि मर्ढेकरांचे समकालीन जीबोनानन्दो दासांची आठवण येते,विशेषत: मुंबई शहरी जीवनाच्या अनुषंगाने येणार्‍या कवितांमध्ये.
"मी एक मुंगी, हा एक मुंगी " या कवितेतल्या.
- सर्वे जन्तु रुटिना : । सर्वे जन्तु निराशया: ॥
सर्वे छिद्राणि पंचन्तु । मा कश्चित्‌ दु:ख-लॉग भरेत्‌ ॥
ह्या ओळी हल्लीच्या आय.टी.च्या कारकुनांना अगदी आपल्यासा वाटल्या तर नवलाई नाही.
"जिथे मारते कांदेवाडी ", "गणपत वाणी ", " ह्या गंगेमधि गगन वितळले" ,"खप्पड बसली फ़िक्कट गाल"," किती दिवसांत नाही चांदण्यांत गेलो" ह्या अजून काही "वाचाव्याच" अशा आणखी काही कविता.
"मर्ढेकरांची कविता" हा संग्रह वाचायचा नाही तर अनुभवायचा आहे. पन्नास वर्षांनंतरही ह्यांतल्या कवितांची प्रासंगिकता कायम आहे. एकेक कविता निवांत वाचावी,प्रतिमा हळूहळू उलगडत जातांना आपल्या हाती मर्ढेकरांना केवळ सलाम करणे राहते. ’शिशिरागम’ ते ’आणखी कांही कविता’ हा प्रवास मर्ढेकरांच्या कवितांचाच नसतो तर मराठी साहित्याच्या एका महत्त्वाच्या स्थित्यंतराचा इतिहास असतो. ’रविकिरण संप्रदायी’ कविता ते ’मर्ढेकरी’ आधुनिक कविता हा इतिहास आपण अनुभवत असतो. त्याचक्षणी विश्वयुद्ध क्र.२ आणि त्यानंतरचे १०-१५ वर्षे हा काळ एका संवेदनशील कवीच्या नजरेतून अनुभवत असतो. उण्यापुर्‍या १२८ कवितांचा हा संग्रह अलगद मनात व्यापून उरतो अन्‌ एक गुणगुण ऐकू येते,
" ह्या सृष्टीच्या निवांत पोटीं
परंतु लपली सैरावैरा,
अजस्र धांदल, क्षणात देइल
जिवंततेचे अर्घ्य भास्करा.
थांब ! जरासा वेळ तोंवरी-
अचेतनांचा वास कोवळा;
सचेतनांचा हुरूप शीतल.
उरे घोटभर गोड हिवाळा!
"

पुस्तकाचे नाव : मर्ढेकरांची कविता
प्रथमावृत्ती : १९५९
पुनर्मुद्रण : १९९४
प्रकाशक : मौज प्रकाशन गृह
किंमत : ४० रुपये


स्वामींचे अभंग -१

 

आयटीचे अभंग

 
 क्युबिकली दिन । कंटाळवाणा सारा ॥ कामाचा भारा । रोजचाच ॥ कीबोर्डवरी नुस्ती । बोटे चालली ॥ रात्र विझली । कामापायी ॥
आयटीत गेला । गुदमरून जीव ॥ कोणा नाही कीव । स्वामी म्हणे॥
 
 
कळपाचा मेंढर । तैसा मी चाललो ॥ रुततच गेलो । गाळात या॥
स्वतंत्र प्रज्ञा । विझुनिया गेली ॥  निर्बुद्ध हमाली । केली सारी ॥
आता गा देवा । करावी सुटका ॥ झालो मी फाटका । स्वामी म्हणे॥
 
 

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