नया मसीहा ना भेजियो

आज सुबह जब ख़बर आई की तिंबक्तू की अहमद बाबा इन्स्टिट्यूट को इस्लामी दहशतग़र्दों ने जला दिया हैं, तो मैं विकल हो उठा । इस संस्था में ३०,००० से अधिक सैकडों वर्ष पुरानी पांडुलिपीयाँ जतन कर रखी थी । और यह सब इस्लामी सुवर्णयुग की एक अनमोल धरोहर थी । क्या नहीं था इन में ? इस्लाम की बातें, कु’अरान की टिपणींयाँ, खगोल,रसायन, गणित की क़िताबे थी !
आक्रमनकारियों द्वारा किताबें जला देना कोई नई बात नहीं, सदियों से यह होता आया हैं । दुसरों की सभ्याता के प्रतिकों को, ज्ञान को नष्ट करनें का सबसे आसान तरिका यहीं होता हैं । भारत में भी हुआ हैं । अपने महान भारत में , जिसे हम ’सहिष्णू’ देश कहते हैं, यहाँ भी कट्टरपंथीयों ने लोकायत(चार्वाक)दर्शन के ग्रंथ नष्ट कर दिए, जो नास्तिकवाद या जड़वाद का दर्शन था । आज चार्वाकदर्शन केवल दुसरे दर्शनों के संदर्भ में मिलता हैं । लेकिन यह सब विरोधी विचारधाराओं को दबा देने के होता था । तिंबक्तू में ऐसा नहीं हुआ । इन्हें जलाया गया क्यूंकि कट्टरपंथीयों ने माना की ये ’ग़ैर-इस्लामी’ है ! अरे भई, जो ज्ञान इस्लामी विद्वानों ने इज़ाद किया था, जो इस्लाम के बारे में था, जिस में शायद पुरानी कु’अरान की, हादिथ की पांडुलिपीयाँ भी शुमार थी , जिसे इस्लामी सुलतानों ने पनाह दी, प्रोत्साहन दिया हो, वह सब आज इस्लामविरोधी कैसे हो गया ? 
कुछ ही महिनों पहले(अक्तूबर, 20१२), सलाफ़ीयों ने(इस्लामी उग्रवादीयों का एक संगठन) मोरोक्को के ’आठ हज़ार वर्ष पुरा्ने” पाषाण पर कुरेदे गये सूर्य के चित्र को नष्ट कर दिया गया था, क्योंकि वह बुतपरस्ती की निशानी थी और इस्लाम बुतपरस्ती की इजाज़त नहीं देता. आज मोरोक्को इस्लामी मुल्क है, वहाँ बुतपरस्ती नहीं होती.अब क्या ज़रूरत थी इसे नष्ट करने की ? वह स्टोन कार्विंग एक अनमोल ऐतिहासिक धरोहर थी. इन सलाफ़ीयोंने बेवज़ह इतिहास हा एक पन्ना नष्ट कर दिया. कुछ वर्ष पूर्व बामियान की बुद्धमूर्ती को भी तालिबानियों द्वारा नष्ट कर दिया गया था । इन दोनों मसलों में समझा जा सकता कि, चूँकि ये क़ाफ़िराना निशान थे, सो इन्हें तबाह कर दिया गया । पर तिंबक्तू की पांडुलिपीयाँ क्यूँ ? 
तिंबक्तू अपनी पांडुलिपीयों के लिए विश्वविख्यात है । सैकडों वर्ष पुरानी लाखों पांडुलिपीयाँ जतन करने की वहाँ परम्परा रहीं है । विद्वानों के लिए तिंबक्तू हमेशा एक पनाहगाह रहा है ! पांडुलिपीयों की देखभाल करने वालों को वहाँ विशेष आदर से देखा जाता हैं । तकरीबन दो साल पहले तिंबक्तू की इस धरोहर के बारे में एक विस्तृत लेख ’ नॅशनल जिओग्राफ़िक’ मासिक में आया था । अपनी धरोहर की हिफ़ाज़त करने की तिंबक्तू की अवाम की जद्द-ओ-जोहद क़ाबिल-ए-तारिफ़ थी । और आज कुछ उग्रपंथीयों ने उनकी मेहनत पर पानी फेर दिया । अपनी ही सभ्यता के निशान मिटाना कब से इस्लामी हो गया ? अगर आप कु’अरान का लिखा ही सच मानते हो और उसी को आधार मानकर हर क़दम उठाते हो, तो बताइएँ कि, किस सुरा , किस आयत में लिखा गया हैं कि, शरि’आ लाने के लिए क़िताबें तक जला डालो ? और वह भी अपनी ही मज़हबी धरोहर ?
अगर ये कट्टरपंथी समझते हैं की दुनिया के सारे मज़हब और फ़िरकों को मिटा देने से और केवल इस्लाम लाने से (वह भी इनका वाला इस्लाम ) दुनिया में अमन कायम हो जाएगा, तो माफ़ किजीएगा हज़ूर, आप ग़लत है । आदमी फ़िरकापसंद है । हमें खुद को फ़िरकों में बाँटना पसंद हैं । पैग़म्बर महम्मद ने इतना साफ़-साफ़ कहा हुआ इस्लाम भी अगर फ़िरकों में बँट सकता है, तो फ़िर से सारी इन्सानियत को एकही फ़िरके तले लाने की कोशिशें फ़ानी है । जैनों के दो फ़िरके बनें- श्वेतांबर, दिगम्बर । बौद्ध धम्म के तीन फ़िरके बनें- महायान, हीनयान, वज्रयान(तंत्रयान) । इस्लाम में भी कई हैं - शिया, सुन्नी,बोहरा,इस्माईली, ज़ैदी,सूफ़ी वगैरा । ख़्रिश्चियानिटी के तो गिन भी नहीं सकते ।
चलो फ़र्ज़ किजीए कि सारी दुनिया में इन का मनचाहा इस्लाम कायम हो गया, बाकी मजहबों के, फ़िरकों के सारे निशानात मिटा दिए गए, हर तरह की इबादतगाहें, मिटा दी गई, शरि’आ लागू हो गया... कितने दिन-महिने-साल कायम रहेगा ? हम फ़िरकापरस्त है, फ़िरकापसंद हैं, इस इस्लाम में भी कोई फ़िरका तयार हो जायेगा, और फ़िर से मजहब के नाम पे खून बहाना शुरू किया जाएगा । दुनिया में एक ही धर्म आ जाने से शांती कायम नहीं होती । बेहतर है की सारे धर्मों को अपने घर में ही रखा जाए, कोई किसी के धर्म में टाँग न अड़ाएँ । जिओ और जिने दो । ’मेरा मज़हब ही सर्वश्रेष्ठ हैं’ यह आग्रह क्यों ? और अपनी बात मनानें के लिए सामनें वाले का गला घोंट देना ? जिसे जो पसंद हो वह उसे करने क्यूँ नहीं देते ? नास्तिक आदमी पाषाणपूजक को यह क्यों कहता हैं कि भय्या इस पत्थर को क्यूँ पूजते हो ? रोज सुबह भगवान के सामने दिया जलाने वाला नास्तिक से ये क्यों कहता है कि, भय्या तुम भगवान में आस्था क्यूँ नहीं रखते ? ख्रिश्चन हिंदू को यह क्यों कहता हैं, कि भाई मंदीर में नहीं, चर्च में आओ ? वैष्णव शैव को यह क्यों कहता हैं कि, शिव की नहीं, कन्हैया को भजो ? कोई किसीको किसी के धर्म के बारे में सवाल पूछना बंद ही क्यों नहीं करता ? ऋषभदेवजी आए, मूसा मसीह आए, वर्धमान महावीर आए, गौतम बुद्ध आए, इसा मसीह आए, पैगम्बर महम्मद आए, नानक आए, सबने वोही शांती-भाईचारें का संदेश दिया, कुछ फ़र्क पड़ा ? हम तो भय्या लड़ते रहे थे, लड़ते रहे हैं, लड़ते रहेंगे । और जितने ज़्यादा मजहब आएँगे, उन में से उतने ही ज़्यादा फ़िरके(पंथ) बनेंगे, और लड़ाई-झगड़ो की तादाद भी उतनी ही बढ़ेगी ।
अब हे भगवान,अल्लाह गॉड  मेहरबानी कर के कोई नया मसीहा ना भेजियो ।

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